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और मैं बस एक किस्सा बन गया होऊँगा।

                
                                                         
                            कुछ दोस्त-यार धीरे-धीरे विदा होने लगे हैं,
                                                                 
                            
आज हूँ, कल शायद मैं भी नहीं रहूँगा,
दीवारों पर टंगी तस्वीरें धुंधली हो जाएँगी,
मेरे दस्तख़त का रंग भी बेरंग हो जाएगा,
एक वहम यह कि रह जाएँगी कुछ यादें ,
शायद नई पीढ़ी को नाम भी न पता होगा।

रह जाएँगी तो बस कुछ रचनाएँ गूगल पर,
कोई मेरे जैसा ही सिरफिरा पढ़ेगा उन्हें,
कुछ पल ख़ामोश रहकर सोचेगा देर तक,
फिर धीरे से कहेगा - वाह, क्या लिखा है!
मेरी ही कोई अधूरी पंक्ति गुनगुनाते हुए,
वो लौट जाएगा अपनी तन्हा शाम में।

उसी तन्हा शाम में जहां से मैंने रुखसत किया था,
वही शाम आज भी उसी मोड़ पर ठहरी होगी,
मेरा इंतज़ार करती, बिना नाम लिए,
जहाँ मेरे कदम रुके थे, वहीं वक़्त रुका होगा,
और मैं बस एक किस्सा बन गया होऊँगा।
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एक महीने पहले

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