ज़िंदगी कहाँ हैज़िंदगी साँसों की धड़कती रवानी में है,
ज़िंदगी दिलों की पावन कहानी में है।
माँ की ममता में, पिता की घनी छाँव में,
ज़िंदगी बचपन की हर नादानी में है।
पहली किलकारी से अंत समय तक,
ज़िंदगी रिश्तों की निगहबानी में है।
दो दिलों के पावन इक़रार में है,
ज़िंदगी दो रूहों के एक तार में है।
दो प्रेमी जो बहते हैं एक धार बनकर,
ज़िंदगी उस बेपनाह प्यार में है।
आँखों से ढलते हुए अश्रुओं की धार में है,
ज़िंदगी ख़ामोश सी किसी पुकार में है।
राहें तिनका तिनका तकती रहें उम्र भर,
ज़िंदगी उस बेवफ़ा के भी इंतज़ार में है।
जिसने माना निष्काम कर्म ही पूजा,
ज़िंदगी उसके ही पावन कर्म में है।
अपनी मेहनत से जो मुक़द्दर लिखे,
ज़िंदगी उसके सच्चे परिश्रम में है।
कल की चिंता में अपना यह आज न खोना,
ज़िंदगी बस इसी मुस्कुराते हुए पल में है।
बीता कल तो कहानी सा बनता चला,
आने वाला समय कल के ही कल में है।
अपने भीतर ज़रा उतरकर तो देखो,
ज़िंदगी अपने अंतर्मन में है।
ना भटक तू इसे ढूँढ़ने को कहीं,
ज़िंदगी तेरे ही हर स्पंदन में है।
‘अगस्त्य’ इतना ही केवल समझ पाया है,
ज़िंदगी जीत में है न ही हार में है;
ज़िंदगी झुककर जो जग को अपना ले,
ज़िंदगी उस नमन के ही सत्कार में है।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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