अक्षरों की बुनाई में बुना है, गुज़री यादों का नज़ारा,
हर इक लफ़्ज़ में धड़कता है, रूहानियत का उजियारा।
नज़र भर के बस उसे ही देखा, जो रूह को लगा प्यारा,
अब उसके बिन सूना लगता है, यह जहाँ सारा का सारा।
परदेसी पंछी उड़ गया, किस देस उसे ढूँढ़ने जाऊँ,
ना ख़त कोई, ना कोई पद-चाप, ना मिलता कोई इशारा।
रातों की राख कुरेद कर, मैंने ढूँढ़ा है नाम तेरा,
हर बुझती चिंगारी बोले, यह इश्क़ अभी है अंगारा।
सूखे पत्तों-सा उड़ता फिरा, तेरी गली से ज़माने तक,
जिसने दिल का मौसम लूटा, वो वक़्त भी हुआ गँवारा।
तेरी याद के भीगे जंगल में, रूह भटकती रही आवारा,
बस एक तेरा ही नाम रहा, बाक़ी सब जग बंजारा।
तूने तो मोड़ लीं आँखें, और किया तूफ़ानों के हवाले,
हम डूब के भी हँसते ही रहे, मिला न जब कोई किनारा।
मन के द्वंद्व में वो जीते, जो लड़ना सीख गए ख़ुद से ,
'अहंकार' का महल ढह गया, जब 'आत्म-विजय' ने सँवारा।
कोई न दर्दी इस दुनिया में, किसे ज़ख़्म अपना दिखलाऊँ,
हर शख़्स यहाँ पत्थर निकला, किसे कहूँ अपना सहारा।
जीवन की इस लंबी राह में, कितना कुछ खोकर पाया,
'अगस्त्य' मिट्टी-पानी से हारा, पर दिल से कभी न हारा।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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