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स्वभिमान की दीपशिखा

                
                                                         
                            निज स्वार्थ से बढ़कर देश प्रेम ,
                                                                 
                            
दीपक की लौ सा जलता सदा ,
ये स्वतः प्रज्वलित हो जाता है ,
प्राणवायु सा घुलमिल जाता है ,
भगीरथ जैसी पवित्र हो भावना ,
गंगाजल सा प्रवाहित होता है ,
देश की मिटटी में है वो सुगंध ,
अनंत प्रेम आच्छादित होता है ,
ये देश प्रेम की अनुभूति ही है,
जो स्वभिमान की दीपशिखा है,
चाणक्य और चन्द्रगुप्त से सीखो ,
यही राजा भोज की पुण्य भूमि है ,
माँ पन्ना ने जब बलिदान दिया था ,
गौरवमयी इतिहास रचित हुआ था ,
शिवाजी ने बसंती रंग चुन लिया ,
तो बसंत आज भी मुस्कराते हैं |
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2 घंटे पहले

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