मेरी हर बात उसको क्यों अच्छी न लगे,
उसे बुरा न लगे, तो मुझे भी बुरी न लगे।
उसे न पूछें कि उसे यह सब कैसा लगे,
हमें अच्छा लगे या न लगे, उसे बुरा न लगे।
बदनाम हम हुए, उसे यह ख़बर न लगे,
उसकी ख़ातिर हुए, काश उसे पता तो लगे।
मौत के ही बिना, हम तो मरने लगे,
हम उस पर मरे, जो बेपरवाह जीने लगे।
हम डूबना चाहें, वो हमें डुबोने लगे,
बात उसे न लगे, हमें भीतर तक लगे।
वो जैसा भी हो, दिल से जुदा न लगे,
उसमें नुक़्स हों लाख, फिर भी बुरा न लगे।
अब कोई भी मिले, उसमें उसकी झलक लगे,
वो फिर से मिले, तो पहले जैसा ही लगे।
बात सच हो, मगर झूठ-सी लगने लगे,
दिल की कहें भी तो बात बनती न लगे।
है जो मन में फ़रेब, वो फ़रेब ही लगे,
फ़रेब कोई न लगे, लाख ऐब जो लगे।
ये मोहब्बत की, अगस्त्य, कैसी रीत है,
दर्द उसका भी हो, पर अपना ही लगे।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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