आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ख़त्म-ए-सफ़र

                
                                                         
                            जिसके लिए यह तड़प हुई, उसे कोई ख़बर न हुई,
                                                                 
                            
दिल की तरसती आह की, उस पर असर न हुई।

हम जलते रहे शब भर हिज्र की आग में तन्हा,
पर रौशनी उसके शहर में, कभी मयस्सर न हुई।

मिटाया बहुत कि दिल से मिट जाए उसका नाम,
मगर याद भी वो उसकी थी, जो बेअसर न हुई।

सहा हर एक सितम को चेहरे पे तबस्सुम रख कर,
दिल की शिकायत कभी, आँसुओं में बसर न हुई।

हमने उसके नाम पर अपनी हर साँस कर दी थी,
मगर उसकी तरफ़ से इधर कोई भी नज़र न हुई।

राहों में उसके इंतज़ार के दीप हर रोज़ जलते रहे,
तमाम उम्र बीत गई, मगर कभी कोई सहर न हुई।

दिल ने उस पत्थर दिल को अपना ख़ुदा मान बैठा,
मगर हमारे इस इश्क़ की उसको कोई क़दर न हुई।

इस राहे इश्क़ में उम्र भर भटक कर देखा लिया ,
मगर तलाश-ए-यार की, कभी ख़त्म-ए-सफ़र न हुई।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर