जिसके लिए यह तड़प हुई, उसे कोई ख़बर न हुई,
दिल की तरसती आह की, उस पर असर न हुई।
हम जलते रहे शब भर हिज्र की आग में तन्हा,
पर रौशनी उसके शहर में, कभी मयस्सर न हुई।
मिटाया बहुत कि दिल से मिट जाए उसका नाम,
मगर याद भी वो उसकी थी, जो बेअसर न हुई।
सहा हर एक सितम को चेहरे पे तबस्सुम रख कर,
दिल की शिकायत कभी, आँसुओं में बसर न हुई।
हमने उसके नाम पर अपनी हर साँस कर दी थी,
मगर उसकी तरफ़ से इधर कोई भी नज़र न हुई।
राहों में उसके इंतज़ार के दीप हर रोज़ जलते रहे,
तमाम उम्र बीत गई, मगर कभी कोई सहर न हुई।
दिल ने उस पत्थर दिल को अपना ख़ुदा मान बैठा,
मगर हमारे इस इश्क़ की उसको कोई क़दर न हुई।
इस राहे इश्क़ में उम्र भर भटक कर देखा लिया ,
मगर तलाश-ए-यार की, कभी ख़त्म-ए-सफ़र न हुई।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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