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ख़ामोश चेहरे

                
                                                         
                            सूनी गलियाँ और ख़ामोश चेहरे,
                                                                 
                            
इस शहर में कोई किससे बोले।

मन ही मन में बातें कर ले ,
ख़ुद ही दिल की गिरहें खोले।

ख़ामोशी में उम्र गुज़र गई,
न लब हिले, न दिल से बोले।

आँखों ने कितने दर्द सँभाले,
अश्कों ने कभी राज़ न खोले।

काग़ज़ पर जो लिख न पाए,
वो जज़्बात क़लम ने बोले।

चेहरों पर मुस्कान बहुत थी,
भीतर भीतर कितने डोले।

तनहाई की चादर ओढ़कर,
यादों ने फ़िर पन्ने खोले।

शायद कोई सुनने आ जाए,
उम्मीदों का ये परिंदा बोले।

'अगस्त्य' साधना चुप की देखी,
फिर लिखे हुए अफ़साने बोले।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
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22 घंटे पहले

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