गुरु-वंदना
राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
गुरु ही जननी, गुरु ही पिता,
गुरु ही जीवन का निर्माता।
अज्ञान तिमिर हर दूर भगाकर,
गुरु ही ज्ञान पुंज का दाता॥
गायत्री का मंत्र सिखलाकर,
गीता तत्त्व गुरु समझाता।
कण कण में जो व्याप्त निरंतर,
चेतना का दीप जलाता॥
कुंभकार बन तन मन गढ़ता,
अहंकार सभी का मिटाता।
बाहर कठोर, हृदय से कोमल,
सत्य-पथ पर चलना सिखाता॥
वेद व्यास की दिव्य दृष्टि बन,
कृष्ण सरीखा पथ दिखलाता।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश स्वरूप,
सृष्टि के रहस्य का बोध कराता॥
सद्गुरु मिथ्या-भ्रम हर लेता,
मन को कभी न भरमाता।
बंधन सारे स्वयं टूट जाते,
आत्मतत्त्व से मिलवाता॥
जीव और शिव का सेतु बनकर,
भवसागर से पार लगाता।
भटके मन को राह दिखाकर,
परमानंद से जो मिलाता॥
गुरु ही बंधु, गुरु ही सखा है,
गुरु ही पावन अमर नाता।
'अगस्त्य' नमन श्री गुरु चरणों में,
गुरु ही मेरा प्राण-विधाता॥
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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