बात कोई भी यूँ बेवजह तो निकलती नहीं,
दिल में जो आग हो, चुपचाप भी जलती नहीं।
धुआँ उठ रहा है तो कुछ आग भी होगी कहीं,
राख यूँ ही तो किसी शोले से बिखरती नहीं।
जिस्म ख़ामोश ही सही, रूह तो सुलगती है,
दर्द की लौ किसी परदे में सँभलती नहीं।
प्यास दरिया से भी गहरी है इस सीने की,
भरा समंदर देखकर यह प्यास बहलती नहीं।
रात ढलती है मगर नींद उतरती ही कहाँ,
यादों की चाँदनी पलकों से फिसलती नहीं।
वक़्त मरहम भी देता है, देता है नई रौशनी भी,
दिल की कुछ चोट मगर उम्र से भरती नहीं।
ज़िंदगी राख हुई, फिर भी धुआँ बाक़ी है,
अपनी हक़ीक़त किसी अफ़साने में ढलती नहीं।
पत्थरों जैसी ख़ामोशी भी कभी बोल उठे,
हर दुआ लफ़्ज़ की ज़ंजीर में पलती नहीं।
दर्द लिखता है 'अगस्त्य' तो कोई बात तो है,
यूँ ही हर साँस क़लम बनकर तो उतरती नहीं।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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