आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अनहद का बसेरा

                
                                                         
                            अनहद का बसेरजब जागे, तब ही भागा सियाह दुश्मन अँधेरा,
                                                                 
                            
अंतरमन में हुआ उजाला, चढ़ गया एक नया सवेरा।

बाहर की सब ऋतुएँ झूठी, भीतर रिमझिम सावन बरसा,
नाम खुमारी ऐसी छाई, मन-मंदिर में हुआ उसका बसेरा।

खिल उठीं मन की कलियाँ, जब उसकी रूह ने डाला फेरा,
दूर हुए सब भ्रम भुलेखे, उजड़ गया सारे ग़मों का डेरा।

'मैं' और 'मेरी' की जंग मिटी, तब असल सुकून मिल पाया,
ख़ुदी मिटी, तब ही दिखा मुझको, चारों ओर एक रूप तेरा।

काया के इस कच्चे कोठे में, जब तेरे नाम की जोत जगी,
लोक-परलोक सब रौशन हो गए, मिट गया कुल अँधेरा।

ख़ुद में ख़ुद को खोकर पाया, उसका सुंदर पावन चेहरा,
रूह में ऐसा नूर उतरा, जो मेरा था, वो सब हो गया तेरा।

पी गया तृष्णा का समंदर, 'अगस्त्य' अजब नज़ारा देखा,
हद की सरहद पार हुई जब, हुआ अनहद का बसेरा।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर