खुद झोपड़े में रहता हूँ ,
महल कहाँ बना पाऊँगा ?
बेरोजगार हूँ ,
प्रेम कहाँ कर पाऊँगा ?
तुम मागोगी चाँद तारे
मैं दे कहाँ पाऊँगा ?
तुम्हें दुनियाँ घूमने की होगी चाह,
मैं तुम्हें कहाँ घुमा पाऊँगा ?
तुम्हारे सपने में तो आते होंगे राजकुमार
मैं कहाँ आऊंगा ?
तुम कहोगी—“कुछ तो लाओ,”
मैं अपना चेहरा छुपाऊँगा।
बेरोज़गार हूँ,
प्रेम कहाँ कर पाऊँगा ?
जब पूछेंगे पिता तुम्हारे
तो तनख्वाह क्या बताऊंगा ?
बेरोजगार हूँ
क्या तुम्हारा हाथ माँग पाऊँगा ?
लग रहा है कि
मैं कुँवारा ही मर जाऊंगा।
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