कैसे बताऊँ मैं तुम्हें*
गुरु मीत है प्रीत है जीवन का संगीत है
मार्ग का प्रशस्त है संघर्ष का शस्त्र है
जिंदगी है बन्दगी है, रोशनी है ताजगी है।
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें.........
गुरु जलता दीप है सीट की सुहानी धूप है
आपका लक्ष्य उसका रूप है, आम लोगों को वो कुरूप है
हंसना उसका स्वरूप है, परिणाम ही प्रसन्न रूप है।
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें.........
गुरु सागर से साहिल है, आपके ख्वाबों का मील है
गुरु को न कोई ढील है, तुम्हारे लक्ष्य का नील है
तुम्हारी आंखों में खुशियों की झील है, मानो पक्षी तो चील है
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें.........
आराम उसे हराम है, देखता सोचता तमाम है
वह पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण ईशान है
तुम्हारा रास्ता मंजिल उसकी पहचान है
गुरु सुन्दर साज है, शिष्य का सरताज है
अपना सबकुछ समर्पण आज है, ज्ञान रूपी मेघ बरसाना यही उसका राज है
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें, गुरु मीत है प्रीत है जीवन का संगीत है।
-राजेश कुमार सेन राज
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