गहरे सैलाब की रवानी मे,
आज साहिल कहीं नहीं मिलती।
डूबते लोग बस समंदर मे,
आज पतवार इक नही मिलती।।
हद से हम आज जो गुजर बैठे,
मंजिलें आसान इक नहीं मिलती।
जुर्रत ए दीवार बढ़ गई ऐसी,
उनकी आहट कोई नहीं मिलती।।
चाँदनी रात अब तो फीकी लगे,
इन बहारों से ना सकूं मिलती।
बात करते हैं चाँद तारों की,
उनको फुर्सत तो अब नहीं मिलती।।
जिन्दगी हो गई है इक पतझड़,
मौसम ए शाद इक नहीं मिलती।
अब तो है बस गुलों में रुसवाई,
इक फिजा आज है नही मिलती।
दायरे उनके जो गुजर बैठे,
रश्म ए इकरार अब नही मिलती।
हमने देखे हैं आज महलों में,
शख्सियत पाक इक नही मिलती।।
आईने झाँक ले दिल-ए-नादां,
अक्स गुलजार अब नहीं मिलती।
तुझको मालूम है नहीं शायद,
कद्र-ए-इश्क अब नहीं मिलती।।
ज्ञान और विज्ञान सिखाया, दर्शन और अध्यात्म
पढ़ाया वेद पुराण लिखे हैं जहां पर, वही भारत देश हमारा ।।
जिस धरा पर प्रभु अवतारी है, दुष्टों का संहार किया।
मर्यादा के सागर बन कर , सागर पर बांध बनाया।।
कृष्ण रुप में पर्वत कर धारण, कालीदह को नाथ लिया
अर्जुन के सारथी बनकर के, कुरुक्षेत्र में गीताज्ञान दिया
लूटने वाले आ आ करके, लूट लूट कर चले गए।
सोना चांदी हीरा मोती, लेकिन ग्रंथ और भाषाएं।।
स्व सभ्यता और संस्कृति, से पहचान बनाई है
आदि गुरु शंकराचार्य ने, विवेकानंद ने राह दिखाई है।।
सत्य सनातन राह है जिसकी, सोने की चिड़िया कहते
आन वान की नहीं कमी , उसको भारत देश है कहते।
पुष्पा मिश्रा आनंद
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