बचपन में उंगली पकड़ कर,
जिनके साथ चले थे हम,
आज वो हाथ छूट गए,
पर छूटा नहीं उनका संगम।
वो दिखते नहीं आँखों को,
पर एहसास में रहते हैं,
हमारी हर धड़कन में,
बनकर विश्वास रहते हैं।
वो चले गए इस जीवन से,
पर यादें यहीं छोड़ गए,
उन्हीं यादों के दीपक से,
हमारा जीवन जोड़ गए।
आज जो कुछ भी कर पा रहे हैं,
ये उन्हीं का आशीर्वाद है,
उनके चरणों की धूल ही,
हमारे माथे का ताज है।
पितृ पक्ष आया है फिर से,
तर्पण को हाथ उठे हैं,
हे पितरों, कृपा बनाए रखना,
आपसे ही हम जुड़े हैं।
बचपन में उंगली पकड़ कर,
जिनके साथ चले थे हम,
आज वो हाथ छूट गए,
पर छूटा नहीं उनका संगम।
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