आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पितरों का आशीर्वाद

                
                                                         
                            बचपन में उंगली पकड़ कर,
                                                                 
                            
जिनके साथ चले थे हम,
आज वो हाथ छूट गए,
पर छूटा नहीं उनका संगम।

वो दिखते नहीं आँखों को,
पर एहसास में रहते हैं,
हमारी हर धड़कन में,
बनकर विश्वास रहते हैं।

वो चले गए इस जीवन से,
पर यादें यहीं छोड़ गए,
उन्हीं यादों के दीपक से,
हमारा जीवन जोड़ गए।

आज जो कुछ भी कर पा रहे हैं,
ये उन्हीं का आशीर्वाद है,
उनके चरणों की धूल ही,
हमारे माथे का ताज है।

पितृ पक्ष आया है फिर से,
तर्पण को हाथ उठे हैं,
हे पितरों, कृपा बनाए रखना,
आपसे ही हम जुड़े हैं।

बचपन में उंगली पकड़ कर,
जिनके साथ चले थे हम,
आज वो हाथ छूट गए,
पर छूटा नहीं उनका संगम।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर