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चारों ओर तबाही होगी

                
                                                         
                            कब तक शोर शराबा होगा कब तक आवाजाही होगी
                                                                 
                            
एक दिन वक्त ठहर जाएगा चारों ओर तबाही होगी

ना ही कोई अदालत होगी ना ही और गवाही होगी
रुतबे का ना खौफ रहेगा ना ही तानाशाही होगी
कब तक शोर शराबा होगा...

कितने भी तू रूप बदल ले चाहे कौड़ी लाख कमा ले
तेरी यह औकात नहीं है सांसों से एक रात चुरा ले
एक एक तेरी करतूतों की सूत समेत उगाही होगी
एक दिन वक्त ठहर जाएगा चारों ओर तबाही होगी

जब सिंहासन छोड़ चलेगा कोई साथ नहीं जाएगा
स्वप्न लगेगा ये जग सारा फूट फूटकर पछताएगा
दो गज कफ़न तुम्हारा होगा फूटी हुई सुराही होगी
एक दिन वक्त ठहर जाएगा चारों ओर तबाही होगी

रिश्तेदार हजारों होंगे घर होगा चौबारे होंगे
बाद आज के जितने भी हैं कोई नहीं तुम्हारे होंगे
कर्म अगर अच्छे होंगे तो चर्चा तेरी सदा ही होगी
एक दिन वक्त ठहर जाएगा चारों ओर तबाही होगी
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एक महीने पहले

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