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घरौंदे

                
                                                         
                            इक महल सा है ये संसार हर देश लगे कमरों से भरे
                                                                 
                            
देश में इंसान कितने पले सबने अपने अलग घरौंदे धरे

सूरत सबकी कहां मिलती स्वभाव भी किंतु अकिंचन
देखें तो लगे परिवार है हम कितने अलग-अलग पर मन,

सब की चाह और पहचान अनेक झलक से तो सब लगते नेक
मन सबका का किस्से से भरा कितने सारे कौतूहल गढ़ा

जीवन जीते हैं नित्य नए परिवार अपनी चलाने को
जिम्मेदारी को तैयार हैं सब हरेक के बोझ उठाने को

अहं के वचन न बोले कभी उत्साह युक्त हर कार्य उठाने को
जीवन उसी का उपयोगी हकदार वही सब पाने को,


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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