एक रोटी का बयान
मैं रोटी हूँ—
गोल जरूर हूँ,
मगर गरीब की दुनिया मेरी तरह गोल नहीं।
उसकी दुनिया में कई कोने हैं—
एक कोने में किराया,
एक में दवाई,
एक में बच्चे की फीस,
और सबसे अँधेरे कोने में
बैठी है भूख।
भोर अभी
अपनी आँखें मल ही रही थी,
कि वह उठ गया।
सूरज को निकलने की जल्दी नहीं थी,
मगर उसे थी—
क्योंकि सूरज देर से निकले
तो शाम देर से होगी,
वह देर से निकले
तो शायद आज भी
चूल्हा न जले।
पत्नी ने पूछा—
“आज कछु खा के जे का ?”
उसने हँसकर कहा—
“काम पे खा लेहो कछु।”
चूल्हे की राख
उसका झूठ सुनकर मुस्कराई।
घर में चूल्हा भी जानता था
कि जिस आदमी के पास
सुबह की रोटी नहीं,
उसके पास दोपहर का भोजन
कहाँ से आएगा?
वह निकल पड़ा।
कंधे पर गमछा,
पैरों में घिसी चप्पल,
और जेब में
कल की बची हुई उम्मीद।
चौराहे पर
उस जैसे बहुत लोग खड़े थे।
कोई राजमिस्त्री था,
कोई बेलदार,
कोई पुताई वाला,
कोई केवल इतना जानता था
कि पेट भरने के लिए
जो काम मिलेगा, कर लेगे।
तभी एक गाड़ी रुकी।
आवाज़ आई—
“पाँच आदमी चाहिए!”
और देखते-देखते
पचास हाथ उठ गए।
उस क्षण
मुझे लगा—
यह हाथ नहीं थे,
पचास घरों के चूल्हे
हवा में उठे हुए थे।
ठेकेदार ने पाँच चुन लिए।
पैंतालीस हाथ नीचे हो गए।
और उनके साथ नीचे उतर गईं—
किसी बच्चे की कॉपी,
किसी माँ की दवाई,
किसी बेटी की फीस,
किसी घर की शाम।
वह भी
उन पैंतालीस में था।
फिर भी घर नहीं लौटा।
गरीब आदमी
खाली हाथ घर लौटने से
उतना ही डरता है
जितना अमीर आदमी
घाटा होने से।
कुछ दूर
दूसरा काम मिल गया।
ईंट ढोने का।
वह ईंट उठाता रहा।
एक ईंट।
दो ईंट।
दस ईंट।
सौ ईंट।
दिन भर
दूसरों का घर
ऊँचा होता रहा,
और उसकी कमर
नीची।
यह कैसी कारीगरी है—
जिसके हाथ
महल खड़ा कर देते हैं,
उसी की छत
बरसात में टपकती है।
दोपहर में
सब खाने बैठे।
उसने नल खोजा।
दो गिलास पानी पिया
और पेट पर हाथ फेरकर बोला—
“आज भूख कम है।”
भूख ने भीतर से
ठहाका लगाया।
गरीब की भाषा में
“भूख नहीं है”
कई बार एक मुहावरा है,
जिसका अर्थ होता है—
“रोटी नहीं है।”
शाम हुई।
मजदूरी मिली।
कुछ मुड़े हुए नोट
उसकी हथेली पर आए।
नोट आते ही
उसके नहीं रहे।
एक पर
किराने वाले का नाम लिखा था,
दूसरे पर
मकान-मालिक का,
तीसरे पर
माँ की दवाई,
चौथे पर
स्कूल की फीस।
उसने बहुत खोजा—
किसी नोट पर
अपना नाम नहीं मिला।
वह बाजार पहुँचा।
आटा लिया,
थोड़ी दाल,
थोड़ा तेल।
दुकानदार बोला—
“और कुछ?”
उसकी नजर
बिस्कुट के पैकेट पर गई।
सुबह बेटा कह रहा था—
“बाबा, आत समय बिस्कुट लेत अइयो।”
उसने पैकेट उठाया।
कीमत देखी।
फिर माँ की दवा की पर्ची देखी।
और पैकेट
वापस रख दिया।
दुकानदार के लिए
वह केवल एक बिस्कुट का पैकेट था,
मगर उस पिता ने
वहाँ अपनी एक छोटी-सी खुशी
वापस रखी थी।
घर पहुँचा।
बेटा दौड़ा—
“बाबा! बिस्कुट?”
उसने झोला पत्नी को दिया
और बेटे के बाल सहलाकर कहा—
“कल।”
गरीब के घर में
सबसे ज्यादा बोला जाने वाला शब्द
शायद यही है—
कल।
कल जूते आएँगे।
कल फीस भरेगी।
कल दवाई आएगी।
कल अच्छा खाना बनेगा।
कल छत सुधरेगी।
लेकिन उसका ‘कल’
बड़ा निर्दयी महाजन है—
रोज उम्मीद उधार देता है
और रात होते ही
ब्याज सहित वापस माँग लेता है।
रात हुई।
चूल्हा जला।
मैं बनी—
रोटी।
एक...
दो...
तीन...
आटा खत्म।
घर में खाने वाले
चार।
माँ बोली—
“मोय भूख निया।”
बाप बोला—
“मैंने रास्ते में खा लाओ तो।”
बच्चों ने विश्वास कर लिया।
पति-पत्नी ने
एक-दूसरे की आँखों में देखा।
दोनों जानते थे—
दोनों झूठे हैं।
पर उस रात
उन दोनों झूठों ने मिलकर
दो बच्चों का पेट भर दिया।
बताओ—
इस झूठ को
पाप लिखूँ
या पुण्य?
मैं रोटी हूँ,
मैंने बड़े-बड़े सत्य देखे हैं,
पर भूखे माँ-बाप का यह झूठ
मुझे सत्य से भी
ऊँचा लगा।
बच्चे सो गए।
छोटा बेटा बोला—
“बाबा, छत में से चाँद दिख रहो है!”
पिता ने ऊपर देखा
और मुस्करा दिया।
माँ ने भी उसी छेद को देखा,
पर उसे चाँद नहीं दिखा—
उसे आने वाली बरसात दिखाई दी।
एक ही छेद था,
बच्चे के लिए
आकाश की खिड़की,
माँ के लिए
अगली मुसीबत का दरवाजा।
रात और गहरी हुई।
सब सो गए।
केवल वह जागता रहा।
उसने अपनी हथेलियाँ देखीं—
रेखाएँ कम थीं,
दरारें अधिक।
लोग कहते हैं
हथेली की रेखाओं में
भाग्य लिखा होता है।
उसकी हथेली में
मुझे भाग्य नहीं मिला—
सीमेंट मिला,
धूल मिली,
ईंट के निशान मिले,
पसीने का नमक मिला।
शायद गरीब का भाग्य
रेखाओं में नहीं,
दरारों में लिखा जाता है।
सुबह फिर हुई।
उसने वही गमछा उठाया।
वही चप्पल पहनी।
सोती हुई बेटी के सिर पर
हाथ रखा।
दरवाजा खोला।
और फिर
उसी चौराहे की तरफ चल पड़ा।
पीछे चूल्हा ठंडा था।
आगे सूरज निकल रहा था।
चौराहे पर
आज फिर पचास आदमी थे।
आज फिर शायद
पाँच ही चुने जाने थे।
वह भीड़ में खड़ा हुआ।
गाड़ी आते ही
उसने सबसे ऊँचा हाथ उठाया—
“मालिक!
मैं चलूँ?”
और मैं—
कल रात उसके बच्चों के पेट में गई
वही आखिरी रोटी—
सोचती रही,
जिस आदमी के हाथों ने
इस शहर को रहने लायक बनाया,
यह शहर अब तक
उसके रहने लायक
क्यों नहीं बन पाया?
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