वह लड़की कहाँ जाए
घर से हारी हुई लड़की
जब ससुराल चली जाती है,
तो अपने हिस्से के आँसू छुपाकर
नई दुनिया बसाने की कोशिश करती है।
ससुराल से हारी हुई लड़की
जब पति के पास जाती है,
तो सोचती है—
शायद यही हाथ मुझे संभाल लेंगे,
शायद यही रिश्ता मुझे अपना लेगा।
लेकिन जब वही लड़की
पति से भी हार जाती है,
तो ज़रा ठहरकर सोचिए—
वह कहाँ जाए?
किस दरवाज़े पर दस्तक दे,
किस रिश्ते से उम्मीद लगाए,
किसके सामने अपना दर्द रखे,
और किससे कहे कि
अब मैं बहुत थक चुकी हूँ।
लड़की को हर बार
एक घर से दूसरे घर मत भेजिए,
उसे ऐसा घर दीजिए
जहाँ उसे हारना न पड़े।
क्योंकि एक स्त्री को
सिर्फ छत नहीं चाहिए,
उसे एक ऐसा ठिकाना चाहिए
जहाँ उसका सम्मान सुरक्षित हो,
जहाँ उसकी आवाज़ सुनी जाए,
और जहाँ उसे
खुद होने के लिए किसी की अनुमति न माँगनी पड़े।
— रजनी
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