तुम इतने बड़े मर्द हो
मैं लड़ना नहीं चाहती थी,
बस इतना चाहती थी—
जितनी अहमियत से
मैं तुम्हारी बात सुनती हूँ,
उतनी ही अहमियत से
मेरी बात भी सुनी जाए।
मुझे उत्तर की भी ज़िद नहीं थी,
कम से कम मेरा प्रश्न तो सुन लेते,
मेरे शब्दों के पीछे छिपे दर्द को
एक बार समझ लेते।
मगर तुमने तो
प्रश्न ही सुनना उचित नहीं समझा,
जैसे मेरी बात
तुम्हारे लिए कोई मायने ही नहीं रखती।
मैं बहस नहीं चाहती थी,
बस संवाद चाहती थी,
मैं जीतना नहीं चाहती थी,
बस तुम्हारे साथ चलना चाहती थी।
फिर भी तुम चुप रहे...
क्योंकि शायद तुम्हें लगता था
चुप रहना ही मर्दानगी है।
तुम इतने बड़े मर्द हो,
कि एक स्त्री की बात सुनना भी
तुम्हें अपने कद से छोटा कर देता है?
— रजनी
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