प्रेम का दूसरा नाम विरह
प्रेम का दूसरा नाम घुटन है,
विरह है, तड़प है, तपन है,
एक ऐसी आग है सीने में,
जिसका न धुआँ है, न दहन है।
जिसके बिना जिया न जाए,
जिसके साथ रहा न जाए,
दिल हर पल उसी को चाहे,
और उसे अपना कहा न जाए।
रातें करवटों में कटती हैं,
दिन उसकी याद में ढलता है,
चेहरा भले ही शांत रहे,
भीतर कुछ हर पल जलता है।
न जीने की वजह मिलती है,
न मरने से छुटकारा है,
प्रेम में डूबे हुए मन का
बस विरह ही सहारा है।
न प्यास बुझती है मिलने से,
न दूरी में चैन आता है,
जिसे भूलना चाहो सबसे ज़्यादा,
वही सबसे ज़्यादा याद आता है।
प्रेम फूलों की सेज नहीं,
यह काँटों पर चलने का नाम है,
जिसमें सुकून की तलाश अधूरी हो,
शायद वही प्रेम की तपन है।
— रजनी
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