प्रेम इतना गहरा हो
प्रेम करो,
प्रेम से बचो मत,
क्योंकि प्रेम से भागकर
मन कभी पूरा नहीं होता।
इतना गहरा प्रेम करो
कि प्रेम ही तुम्हारी प्रार्थना बन जाए,
इतना सच्चा प्रेम करो
कि सामने वाला तुम्हारे लिए
सिर्फ इंसान नहीं,
परमात्मा का रूप बन जाए।
प्रेम में हिसाब मत रखो,
कितना दिया, कितना मिला—
इन सवालों से प्रेम छोटा हो जाता है।
बस इतना प्रेम करो
कि उसकी खुशी में तुम्हारी खुशी हो,
उसके दर्द में तुम्हारा हृदय रोए,
और उसकी मौजूदगी
तुम्हारे भीतर ईश्वर की अनुभूति जगा दे।
क्योंकि प्रेम जब अपनी गहराई तक पहुँचता है,
तो वह सिर्फ रिश्ता नहीं रहता—
वह भक्ति बन जाता है,
वह समर्पण बन जाता है,
और वही प्रेम
धीरे-धीरे परमात्मा तक पहुँचा देता है।
— रजनी
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