प्रेम और विवाह
प्रेम और विवाह
दो अलग-अलग संसार हैं,
एक में भावनाओं की ज़रूरत होती है,
दूसरे में व्यवहार की भी।
प्रेम में बस दिल काफी होता है,
मगर विवाह में
दिल के साथ
जिम्मेदारियाँ भी निभानी पड़ती हैं।
और मैं तो ठहरी पगली,
विवाह में प्रेम खोजती रही,
हर खामोशी में अपनापन,
हर दूरी में कोई मजबूरी खोजती रही।
उम्मीदों की माला लिए
दर-दर भटकती रही,
अपने ही रिश्ते में
प्रेम की तलाश करती रही।
शायद इसी तलाश ने
मुझे मीरा बना दिया,
जिसे अपना समझकर चाहा,
उसी की भक्ति में
मैं खुद को भूलती चली गई।
आज समझ आया—
प्रेम केवल महसूस करना नहीं,
विवाह में उसे व्यवहार में उतारना भी पड़ता है।
— रजनी
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