आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरी कब्र पर

                
                                                         
                            मेरी कब्र पर
                                                                 
                            

मेरी कब्र पर
ज़्यादा ड्रामा न मचाया जाए,
जो आज सबसे ज़्यादा हमदर्द हैं,
उन्हें भी मेरे साथ लिटाया जाए।

जीते-जी जिन्हें
मेरी तकलीफ़ दिखाई नहीं दी,
आज मेरे जाने पर
आँसू बहाने की ज़रूरत नहीं।

जो मेरे दर्द में
कभी मेरे साथ खड़े नहीं हुए,
वे मेरी कब्र पर
झूठे किस्से न गढ़ें।

मेरी खामोशी को
अपनी मोहब्बत का नाम न दें,
जो जीवन भर साथ न दे सके,
वे मौत के बाद
मेरा अपना होने का दावा न करें।

बस इतना करना—
मेरी कब्र को
दिखावे से दूर रखना,
और जो सबसे बड़े हमदर्द बनते हैं,
उन्हें भी मेरे साथ ही सुला देना।
— रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर