मन में खोट भरी और मुख में हरि,
फिर मंदिर में जाने से क्या फ़ायदा।
हृदय में कपट और होंठों पर भक्ति,
ऐसी पूजा निभाने से क्या फ़ायदा।
मन का मैल न धोया, बस तन धो लिया,
फिर गंगा में नहाने से क्या फ़ायदा।
दूसरों के दिल को छलते रहे उम्रभर,
फिर तीर्थों पर जाने से क्या फ़ायदा।
ईश्वर तो मन के भीतर बैठा है,
वह दिखावे से कभी प्रसन्न नहीं होता।
जिस हृदय में दया और सत्य नहीं,
वहाँ दीप जलाने से क्या फ़ायदा।
पहले मन को निर्मल करना सीखो,
फिर पूजा-पाठ का मान बढ़ाना।
इंसान के दुख में इंसान बनकर खड़े हो,
यही है सच्चा धर्म निभाना।
-रजनी
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