आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

लफ़्ज़ों की लड़ाई

                
                                                         
                            लफ़्ज़ों की लड़ाई
                                                                 
                            

शुक्रिया करूँ मैं अपनी लड़ाई को,
या शुक्रिया करूँ तेरी लड़ाई को,
कविता तो बनती है इसी
लफ़्ज़ों की लड़ाई में।

शुक्रिया करूँ अपनी मूर्खता को,
या करूँ तेरी चालाकियों का,
तूने जो दिया दर्द,
वही तो कारण बना मेरे अल्फ़ाज़ों का।

तूने मुझे तोड़ा,
मैंने ख़ुद को शब्दों में जोड़ लिया,
तूने जो समझा कमज़ोर मुझे,
मैंने उसी दर्द को अपना हुनर बना लिया।

अब सोचती हूँ—
शुक्रिया तेरा करूँ
या अपनी नादानियों का,
क्योंकि तेरी चालाकियों ने ही
मुझे आईना दिखाया मेरी कहानियों का।

जो कभी आँसू थे,
आज वही कविता बन गए,
हम हारकर भी
अपने अल्फ़ाज़ों में जीत गए।

- रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर