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क्या ईश्वर इतना बेरहम है?

                
                                                         
                            क्या ईश्वर इतना बेरहम है?
                                                                 
                            

स्त्री की वजह से ही तो
सारे देवी-देवता जीवित हैं,
जिस दिन स्त्री पूजा करना छोड़ दे,
सोचो, फिर कितने देवता जीवित हैं?

सबसे ज्यादा स्त्री ही
ईश्वर के आगे सिर झुकाती है,
अपने हिस्से के दुख सहकर भी
दूसरों के लिए दीप जलाती है।

व्रत रखती है, मन्नत माँगती है,
हर रिश्ते की सलामती चाहती है,
अपने लिए कम, अपनों के लिए ज्यादा
ईश्वर से दुआ करती जाती है।

फिर सबसे ज्यादा शोषण भी
स्त्री का ही क्यों होता है?
उसके आँसू देखकर भी
समाज इतना खामोश क्यों होता है?

जिस स्त्री के हाथों से
मंदिर में दीप जलते हैं,
उसी के जीवन में अक्सर
अंधेरे क्यों पलते हैं?

जिसे देवी कहकर पूजते हो,
उसे इंसान समझना भूल जाते हो,
मंदिर में सम्मान चढ़ाते हो
और घर में उसका सम्मान घटाते हो।

कभी तो ईश्वर से पूछना—
ये कैसी तेरी दुनिया है?
जो सबसे ज्यादा तुझे पूजती है,
वही सबसे ज्यादा क्यों दुखिया है?

अगर तू सच में सबका ईश्वर है,
तो इतना भेदभाव कैसा है?
जिस स्त्री के आँचल में
तेरी सृष्टि पलती है,
उसके हिस्से में इतना दर्द—
क्या ईश्वर इतना बेरहम है?
— रजनी
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7 घंटे पहले

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