जो गुज़ारी न जा सकी
जो गुज़ारी न जा सकी हमसे,
हमने वो ज़िंदगी गुज़ारी है,
कम ख़्वाब थे आँखों में,
फिर भी हर ख़्वाब से हारी है।
छोटी-सी कुछ ख़्वाहिशें थीं,
कुछ अरमान अधूरे थे,
जिन्हें अपना समझा था हमने,
वही हमसे सबसे दूर थे।
न दौलत की चाहत थी,
न शोहरत का कोई सपना था,
बस थोड़ा-सा सुकून चाहिए था,
कोई अपना हो—बस इतना था।
मगर वक़्त भी क्या खेल खेलता है,
हर ख़ुशी हमसे रूठ गई,
जिस ज़िंदगी को जीना था हमने,
वही कहीं पीछे छूट गई।
हम हँसते रहे दुनिया के आगे,
अंदर से मगर टूटते रहे,
कुछ दर्द कहे नहीं हमने,
कुछ दर्द उम्रभर ढोते रहे।
जो गुज़ारी न जा सकी हमसे,
हमने वो ज़िंदगी गुज़ारी है,
कम ख़्वाब थे आँखों में,
फिर भी हर ख़्वाब से हारी है।
— रजनी
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