ज़िंदगी का सफ़र
ये ज़िंदगी भी ना, मंज़िल का लालच देती है,
उम्र भर इंसान को, सफ़र कराती रहती है।
हर मोड़ पर, नई उम्मीद जगाती है,
हर राह पर, नए ख़्वाब दिखाती है।
हम सोचते हैं, अब मंज़िल मिल जाएगी,
मगर मंज़िल के पास, नई राह आ जाएगी।
कुछ पाने की चाह में, बहुत कुछ छूट जाता है,
कभी वक़्त, कभी रिश्ते, कभी सुकून खो जाता है।
फिर भी इंसान, चलता ही रहता है,
क्योंकि रुक जाना, उसे आता नहीं।
एक दिन समझ आता है, मंज़िल तो बहाना थी,
ज़िंदगी तो हर पल, सफ़र ही कराती थी।
— रजनी
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