इच्छाओं का मिट जाना
इच्छाओं का मिट जाना ही
मोक्ष की प्राप्ति है,
जब कुछ पाने की चाह न रहे,
तभी तो मन की मुक्ति है।
जिसे पाने की चाह थी,
वही बंधन बन गया,
जिसे खोने का डर था,
वही जीवन का कारण बन गया।
जब न पाने की खुशी हो,
न खोने का कोई ग़म,
जब संसार के मेले में भी
मन रह जाए बिल्कुल शांत और निश्चल।
न शिकायत किसी से रहे,
न अपेक्षा किसी से हो,
न कल की कोई चिंता हो,
न बीते कल का कोई बोझ हो।
जब ‘मेरा’ और ‘तेरा’ मिट जाए,
जब चाहत भी विराम ले,
तब समझना—
मन ने संसार को नहीं,
स्वयं को जीत लिया है।
इच्छाओं का मिट जाना ही
मोक्ष की प्राप्ति है,
मन का अपने भीतर लौट आना ही
शायद जीवन की अंतिम शांति है।
— रजनी
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