अति के बाद क्षति
हर चीज़ की एक सीमा होती है,
सीमा जब पार हो जाती है,
तो खुशियाँ भी बोझ बन जाती हैं,
और सुविधा भी सज़ा बन जाती है।
अति चाहे प्रेम की हो या घमंड की,
अति चाहे धन की हो या अधिकार की,
जब संतुलन जीवन से चला जाता है,
तो अंततः कुछ न कुछ टूट जाता है।
इसलिए जो मिला है, उसे संभालकर रखो,
हर रिश्ते को सम्मान देकर रखो,
क्योंकि प्रकृति का नियम अटल है—
अति के बाद क्षति तय है।
— रजनी
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