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ऊँचाइयों को छूने की चाह में

                
                                                         
                            ऊँचाइयों को छूने की चाह में,
                                                                 
                            
क्यों अपना चैन गंवाते हो?
पहले अपने भीतर झांको,
क्यों खुद से ही दूर जाते हो?

जीवन में जो भी नीचा है-
अहंकार, ईर्ष्या, या छल,
उसे पहचानकर छोड़ देना ही,
बनाता है मन को निर्मल |

शिखर पर पहुंचना बड़ी बात नहीं,
यदि चरित्र ही बौना रह जाए |
असली ऊंचाई तो तब मिलती है,
जब मन हर बुराई से ऊपर उठ जाए |

दुनियां को जीतने से पहले,
अपने भीतर का अंधेरा हराना सीखो |
ऊंचाई की चिंता छोड़ो,
पहले अपने नीचपन को छोड़ना सीखो|
- रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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