गैरों की गुज़री, पता नहीं,
हम अपनी गुज़ार बैठे हैं।
दुनिया से हमें क्या लेना,
हम अपनी ज़िंदगी गुज़ार बैठे हैं।
कौन किसके साथ चला,
कौन किसके साथ ठहर गया,
हमें हिसाब नहीं किसी का,
जो मिला, उसे स्वीकार बैठे हैं।
दुनिया अपनी राह चले,
हम अपनी राह चले हैं,
गैरों की ख़बर नहीं अब,
हम अपना संसार बनाए बैठे हैं।
— रजनी
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