आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सच ( कविता )

                
                                                         
                            सच (कविता)
                                                                 
                            

आज मैंने एक
तमाशा देखा,
हँसने-हँसाने वाला नहीं,
दिल दुखाने वाला देखा ।
झूठ के साथ ज़िंदाबाद
के नारे लगाते
और सच एक घर
में छुपा देखा।
झूठ के होंठों पर लाली,
सच की आँखों में
लाली को देखा,
आज मैंने एक
तमाशा देखा ।

झूठ खूब झूठ बोल कर
आराम से सोता देखा
सच कर -कर सेवा
रात को सोने के लिए
दवाई लेते देखा,
आज मैंने तमाशा देखा ।

झूठ के साथ
गवाहों की लंबी
लाईन को देखा,
सच एक गवाह के
लिए मिन्नत
करते देखा,
आज मैंने —
————।

झूठ को हर राह
पर लोगों से हाथ
मिलाते देखा,
सच के सामने से
लोगों को रास्ता
बदलते देखा,
आज मैंने—
————।

आज मैंने एक
अलग तमाशा देखा,
झूठ तड़प-तड़प
कर मौत का इंतज़ार करते
और ‘ राजन ‘ को
आराम से जाते देखा,
आज मैंने
एक तमाशा देखा ।
-राजन शर्मा ‘ कुराली ‘
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर