सच (कविता)
आज मैंने एक
तमाशा देखा,
हँसने-हँसाने वाला नहीं,
दिल दुखाने वाला देखा ।
झूठ के साथ ज़िंदाबाद
के नारे लगाते
और सच एक घर
में छुपा देखा।
झूठ के होंठों पर लाली,
सच की आँखों में
लाली को देखा,
आज मैंने एक
तमाशा देखा ।
झूठ खूब झूठ बोल कर
आराम से सोता देखा
सच कर -कर सेवा
रात को सोने के लिए
दवाई लेते देखा,
आज मैंने तमाशा देखा ।
झूठ के साथ
गवाहों की लंबी
लाईन को देखा,
सच एक गवाह के
लिए मिन्नत
करते देखा,
आज मैंने —
————।
झूठ को हर राह
पर लोगों से हाथ
मिलाते देखा,
सच के सामने से
लोगों को रास्ता
बदलते देखा,
आज मैंने—
————।
आज मैंने एक
अलग तमाशा देखा,
झूठ तड़प-तड़प
कर मौत का इंतज़ार करते
और ‘ राजन ‘ को
आराम से जाते देखा,
आज मैंने
एक तमाशा देखा ।
-राजन शर्मा ‘ कुराली ‘
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