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क्या सचमुच ये मोहब्बत हमारी है?

                
                                                         
                            मेरी आँखों में तेरा अक्स है, तेरी आँखों में पर्दादारी है,
                                                                 
                            
क्या सच में ये मोहब्बत की दुनिया हमारी है?
तेरे ख़ामोश लबों पर भी कोई बात ठहरी-ठहरी सी है,
मेरी धड़कन में तेरी यादों की बेकरारी है।
तुझे देखा तो लगा वक़्त वहीं रुक-सा गया,
तेरी आँखों में कैसी अजब-सी ख़ुमारी है।
हमने चाहा है तुझे ख़ुद से भी बढ़कर लेकिन,
तेरे हिस्से में अभी जमाने भर की लाचारी है।
तू दूर होकर भी करीब हैं मेरे जिस्मों-जां में कहीं
तेरी यादों से सजी रात भी मुझे प्यारी है।
लोग कहते हैं मोहब्बत में सुकूँ मिलता है,
हमने जाना है कि इसमें भी अजब सी बेकरारी है।
न कोई वादा, न इकरार, न रिश्ता कोई,
फिर भी हर साँस में तेरी ही भागीदारी है।
‘राज’ इतना ही बता दे ये दिल को समझाकर,
जो मेरी आँख में तू है, क्या वही दुनिया हमारी है?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

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