आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मौन पिता

                
                                                         
                            पिता को मैंने अक्सर
                                                                 
                            
मौन, बेचैन और गहरी तकलीफ़
में देखा है।

पिता को मैंने अक्सर
अपनों की जरूरतें पूरी करते-करते,
अपनी उम्र को गंवाते देखा है।

पिता को मैंने अक्सर
एक ही कमीज़ के उधड़े
धागों को सुई से सिलते देखा है।

हाँ, पिता को मैंने अक्सर
खुद को जलाकर
अपनों को तकलीफों से
निकालते देखा है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर