पिता को मैंने अक्सर
मौन, बेचैन और गहरी तकलीफ़
में देखा है।
पिता को मैंने अक्सर
अपनों की जरूरतें पूरी करते-करते,
अपनी उम्र को गंवाते देखा है।
पिता को मैंने अक्सर
एक ही कमीज़ के उधड़े
धागों को सुई से सिलते देखा है।
हाँ, पिता को मैंने अक्सर
खुद को जलाकर
अपनों को तकलीफों से
निकालते देखा है।
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