बैठा मैं फिर एक शाम,
गोमती सागर के उस तट था।
हिलता-डुलता सा उसका जल था,
मानो कुछ कह रहा वह हर पल था।
क्या बोलती नहीं लहरे? क्या सुनती नहीं लहरे ?
देखो कैसे-कैसे शब्द कहे कितने उथले, कितने गहरे?
वो लहरें बच्चों की तरह दौड़ी सी आती
एक दूसरे के ऊपर वो चढ़ती सी आती
कौन आगे कौन पीछे रही
कौन ऊपर कौन नीचे रही
वह प्रतिस्पर्धा करती सी आती
दूर से आती हर एक लहर,
लाती थी मानो कोई संदेश।
जैसे कह रही हो पास बुलाकर-
"छोड़ इसे, आ जाओ हमारे देश"
उनका आना, तट से टकराना,
और फिर एकाएक बिखर जाना...
मानो दर्शाता हो इस नश्वर जीवन को,
दर्शाता हो जीवन के अंतहीन संघर्षों को!
क्या यह ज़िद मानव ने सीखी लहरों से,
या लहरों ने सीखी मानव से?
दोनों में मैंने एक बात समान पाई,
आगे बढ़ने की वही धुन हर ओर समाई।
एकटक देखता रहा मैं उन हज़ारों लहरों को।
बात यह कितनी अजीब थी—
न वे रुकीं पल भर के लिए,
न मैं थका पल भर के लिए।
जो न हो यकीन मेरे इस खत पर,
तो जाना उस सागर के तट पर,
सुनना, वो लहरें कुछ कहती हैं,
हाँ, वो लहरें कुछ कहती हैं।
यह पंक्तियाँ मैं या मेरी कलम नहीं,
वो लहरें खुद लिखती हैं,
वो लहरें खुद लिखती हैं!
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