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स्वयं में ही ब्रह्म हूं

                
                                                         
                            किरदार मैं कहानी का
                                                                 
                            
कराता जा रहा हूं
वो देते जा रहे हैं
मैं निभाता जा रहा हूं
है यहीं दिवा स्वप्न
घेरे मुझे यहां
झकझोरता कोई तो
होता हूं कहां?
हैं किस्से कई हजार
गिनाता जा रहा हूं
याद आते जा रहे हैं
मैं सुनाता जा रहा हूं।
सोच में है रूप कोई
साथ कोई और है
जो साथ दे रहा वो
हाथ कोई और है।
काम क्रोध लोभ मोह
मिटाता जा रहा हूं
वो खेलते जा रहे हैं
मैं हराता जा रहा हूं।
इक कवि की कल्पना का
रूप कोई मिट गया
अमावस रात मानो
चांद कोई सिमिट गया
जागृति का अम्रित पान
पिलाता जा रहा हूं
राधे देते जा रहे हैं
मैं लुटाता जा रहा हूं।
-राहुल श्यामजग
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एक घंटा पहले

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