कोई और...
बात की जाए...
मन की,
एक ना मानी जाए!
थोड़ी-सी,
बढ़ोतरी तो हुई है...
एक जगह,
ज़िंदगी के रहने से... तो अच्छा ही है?
कोई ख़याल नहीं...
फिर भी, जी, इतना भारी क्यों हो रहा?
बहला फुसला... बातों में लगा...
चुपके से, इत्ती सारी, रद्दी कौन रख गया?
एक गुहार किए...
प्रभु के, दर पे पड़े हैं :(
कई मांगें नकार दी गईं...
पर, हम भी ज़िद्दी बड़े हैं!
नहीं कुछ और... हम मांगते हैं...
हसीं ज़िंदगी का... दौर चाहते हैं
पायी हुई को... जो कभी भूले थे...
चलो, जगी तो चाह... ज़ोरों से!!!
-राहुल
.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X