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शोरगुल के दौरान

                
                                                         
                            चारदीवारी में
                                                                 
                            
फसा अँधेरा

पंखे की
हवा देने में
कंजूसी

ठंडाता फर्श
पाओं में,
कँपकँपी दे

सोफे का
'इक्कर' पाया
अखबार की गिट से
समतल किया गया

सकरी सी किचन
बरामदे में टंगा,
झूला

छत पर बजरी डली हुयी

मकान का काम
जो कभी खतम
नहीं होता

मिष्टान बनने की खुशबु
तलती पुरी की,
चिट-चिट आवाज़

रोशनदान से
आती रोशिनी

नाना की
फटी कमीज
जो अब
पैर-पोछना
बन चुकी है

दरवाज़े की सांकल पर
आधी-चिपकी पन्नी

बेडशीट की सलवटें
जो एक सी नहीं की गयी
कोई बेतरतीब ढंग से
सोया हुआ होगा

अखबार की घड़ी
जो खोली नहीं गयी

परीक्षा के लिए
खरीदी गयी
नयी तख्ती

मंदिर के भजन
मंदिर से कोसों दूर भी
सुनाई देते हुए

खिड़की के
खाने से
मनी प्लांट की
बाहर आती पत्ती

गाये के गले में बंधी
घंटी की रुनझुन

तम्बाकू की पीक
जो चुपके से थूकी गयी

हिदायत मिली
कि चटकी चूड़ी का
कांच मत चुभा लेना

मेरी कमियां ढूंढने की
आदत
जो दीवालों की किनार पर
लटके
मकड़ी के जालों पर...
नज़रें,
गड़ाए हुए हूँ


राहुल श्रीवास्तव
सागर (मध्य प्रदेश)
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2 वर्ष पहले

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