आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जो फेंकने थे मलाल

                
                                                         
                            असंभव सा
                                                                 
                            
क्यों लगता है?

क्यों ख़ुदा
सदियों से...

एक ख़्वाब... ख़्वाब बना हुआ है :(

मैं ना
हार मानता हूं

मैं ना
सब वारता हूं

भगवान क्यों नहीं तू
मुझे बचा लेता है?

मेरी, अधूरी मेहनत की...
कमी भर देता है?

अब बस
मैं ही हूं अपने साथ

दिल में बसाए
जो फेंकने थे मलाल

रौशनी, फूटे कभी,
इस काली घटा से...

नूर, जाने से पहले...
कुछ दिन रहकर जाए

-राहुल



.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर