दृढ़ संकल्प
मेरे बस की बात नहीं?
चट्टान, को थोड़ी ना बनाती
भुरभुरी मिट्टी...
कुछ चीज़ें
अगर बदल जाएं
बाग़ में,
कभी हम भी चल पाएं
ज़ख्म को कुरेद के
कुछ नहीं मिलता...
सूख...
खून जाता...
पेन ये,
नाखून सा...
तन्हाई, थोड़े दिन,
और सहन कर लूं
तिश्नगी के कीट,
तुम मुझे थोड़ा और घुन लो!
कभी तो
मुझे चैन मिलेगा
हर सदा को
नहीं सुनूंगा
अपनी राह पे
बस चलूंगा...
-राहुल
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