ख़ुदा,
मेरे जहां की सूरत बदल दें?
कब तक साल...
बेकारी की आग में झुलसेंगे
कब तक बहार...
को हम जमाल की चाह में बंजर करेंगे...
तन्हाई से
बहुत डर लगता है :(
कि भूखे मरने की भी
कम चिंता है...
उनका,
अच्छा चाहने वाला हूं
मैं जितना भी
उन्हें पहचाना हूं
बस यही की...
यार, दगा ना दे दे
हमें सुधरने का...
एक मौका दे दे?
(मौका आपसे मांगना चाहिए...
क्या करें, इंसानों के, इतने डर घेरे हुए)
'दो हफ्ते'
रोज़ सुबह...
मुझे गले लगानी है!
समय-सारिणी
को ही...
ज़िंदगी माननी है
कि निभ सके... ऐसी बनानी है!
डर
कैसा राहुल?
हर एहसास... फ़ानी है...
तेरे इस आगाज़ में...
नहीं बेईमानी है
.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X