कैसे कैसे
सवाल, मन में बनते हैं
जिसपे
जानकार...
दूर हमसे रहते हैं
कि परेशान,
पूछ पाछ ले
कि अनजान में,
ख़ुदा मिल निकले
बहकावों से,
क्या बात कहनी है?
'उस तरफ नहीं देखना'
ये पक्का इलाज थोड़ी है?
उसकी तो...
यहीं यहीं... गश्त जारी है...
एक आध दोस्त हो
कायको ही लिखूं मैं!!!
कि थोड़ी, बिन हिसाब किताब की ज़िंदगी...
तीन चार, दिनों के लिए ही सही...
जी लूं मैं 🙂
ठीक है,
पेट के लिए
रोटी कमा लूं
अब तो
बुनियादी चीज़ों का
महत्त्व मान लूं!
उलट पुलट,
वक़्त की खपत कर,
ज़िंदगी, खिसकती खिसकती... खुलती... आयी है
पसंद के कहे पर,
एक बुलावे पे चल देने पर,
चाह के, नशे में... धुत रहकर
एक ही जगह, गाड़ी... गोल गोल घुमाई है :(
कुछ कुछ बातें...
अब मानी हैं
कित्ती संकल्प में
बेईमानी है?
जो भी है...
-राहुल
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