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छोटा पत्थर

                
                                                         
                            अधूरे काम
                                                                 
                            
निपटाता हूं

फिर नक़्श और
बनाता हूं...

कुछ को फाड़ता हूं... :(

कुछ को
पूरा कर...

सीने में ठंडक पाता हूं

चलो, चुप रहने का तो
हुनर मिला मुझे 

शोर करता सन्नाटा!
एक-दो खट के बाद से...

अतीत की तस्वीर
पल भर को चमक जाती है

वो सुहानी हो कर भी
कम-सी अच्छी है 

हर कहानी...
एक ही मूल बात कहती है

कि पशेमानी...
मेरे प्रयास से मिटनी है, बननी है

चलो राहुल,
बाद में लिखना...

पहले इस कागजी काम से फ़ुर्सत होओ!

उस समस्या का भी
हल निकल आएगा...

कुछ ना कुछ सोच ही तो रहे हो रोज़ तुम


.
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5 घंटे पहले

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