सपनों में,
तो यादें...
आ ही जातीं हैं!
रातों में,
आंखें...
पहरा, कहां दे पातीं हैं?
हम,
शुभ शुभ ही बोलेंगे!
कदम
भी उस ओर फेरेंगे...
जो भगवान,
आपको मेरा करना हो
जो मकाम
क़िस्मत में लिखा हो
कभी आएगी वो शाम...
जब अच्छे दिन, माह... गुज़र चुके होंगे...
चलती हवा... करेगी सलाम...
हम अच्छे मन, दिमाग में ढल चुके होंगे
मैं,
कुछ नहीं चाहता प्रभु 🙏
मेरी बुद्धि को
आपने ही दिया नूर...
यहां,
हर तरह के लोग हैं...
(समझदारों... से ज़्यादा...
गिचड़ते नहीं सोग हैं)
क्या पता
मैं पा जाऊं...
खोए हुए... खुदको?
और
आने लगे
देखनी...
भय और सावधानी की... लकीर को?
कि हम उसमें
माहिर हों चुकें हों... ?
ये शब्द,
अक्सर दिखाते...
अलग लोक...
कि
कुछ हकीकतें...
करें रहतीं ओट...
आ जाता छोर
-राहुल
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