क्या जुर्म,क्या ख़ता,बताया करो हमसे,
इस बहाने मुलाकात किया करो हमसे।
दास्तान-ए-इश्क मज़मून-ए-खबर नहीं,
पेड़ के सायों में मिला करो हमसे।
दीवाना-वार फिरते हैं तेरी रहगुज़र में,
कभी तो मस्ताना-वार मिला करो हमसे।
सजदे तुम्हारी राह में गर इबादत नही,
मयकदे के प्यालों में मिला करो हमसे।
उल्फ़त ओ यारी में कुछ तो फर्क हो
जुदा अंदाज से गले लगा करो हमसे।
आना न आना ये तुम पे छोड़ रखा है,
खत ओ किताबत तो किया करो हमसे।
कैसे कटेगी ये उम्र गम-ए-हिज्रा मे
कभी तो ये सवाल किया करो हमसे।
वफाओ-़जफ़ाओ का हिसाब जो करो,
बरसात के मौसम में मिला करो हमसे।
राहुल निगम
कानपुर
7905509032
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