अच्छा होता
तू मुझे जानती ही नहीं, हम कभी मिलते ही नहीं
मुझे पता ही नहीं चलता मोहब्बत क्या होती है
कैसे एक परिंदे को आसमान प्यारा होता है
कैसे एक परवाने को शमा गले लगाती है
कैसे एक राहगीर को एक हमराही चाहिए होता है
अच्छा होता
तू मुझे जानती ही नहीं, हम कभी मिलते ही नहीं
चाँद को चाँद सा ही देखता मैं
फूलो में ख़ुशबू ना ढूंढता मैं
अधूरी ख्वाहिशे लिए ना फिरता मैं
तेरे शहर से अनजान ही रहता मैं
अच्छा होता
तू मुझे जानती ही नहीं, हम कभी मिलते ही नहीं
खूबसूरत जगहें तेरे साथ देखने की
कभी ख्वाहिश ही ना करता मैं,
मशरूफ़ था तेरे इश्क़ में मजनू की तरह
अपनी दुनिया को बेरंग होते यूँ ना देखता मैं,
अगर पता होता रक़ीब के बारे मुझे
तेरी तरह चेहरे पर नक़ाब रखता मैं,
टुकड़ो में बिखर कर रह गया हूँ
शायद किसी को पूरा मिलता मैं ॥
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