सोचता हूँ कर दूँ समर्पण
मोह का,
त्याग दूँ
इक्षचितों को
जो कुचलती
स्वाभिमान को
हर पल।
त्याग दूँ हर मार्ग
को जो
मूक बनाती प्रतिपल।
तोड़ती ह्रदय की
पंखुड़ियों को
नित्य जो साज
सोचता हूँ कर दूँ,
'समर्पण' सब आज …
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