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जीवन की नश्वरता और आत्मबोध

                
                                                         
                            मिट रही तन्हा जीवन की डगर,
                                                                 
                            
फिसल रही है जैसे मुट्ठी से रेत।
जाग मुसाफ़िर, मुक़ाम गया गुज़र,
कब से सोया ख्यालों की सेज पर।

सुख-चैन की मस्ती में होके मगन,
भूल बैठा राही, मेरी मंज़िल कहाँ?
चुगता रहा दाना, समझ तू मोती,
हीरा जो था तेरा, वो भी खो चुका।

अपनों की इस भीड़ भरे संसार में,
कारवां ये हमसे बिछड़ता ही गया।
लाखों मिले हमसफ़र इस राह में,
जब उड़ा यह हंस अकेला ही चला।

याद कर उस आभामंडल चक्र को,
गहराई सागर की बसे तेरे चित में।
माथे से लगा ले गुरु चरण-रज को,
मिल जाएंगे प्रभु तुझे एक पल में।

 
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2 घंटे पहले

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