जो कुछ हमने पाया है,
अब तक तेरी रहमत से।
वह सब कुछ गंवा दिया,
इस आदमीयत के गुरुर में।
कमी नहीं किसी बात की,
बरकत से भर दिया दामन।
कैसे करूँ मैं बखान आपका,
अकारण हुई इस इनायत का।
कमी नही आपके नवाज़ने में,
हमने भी नहीं की देर लुटाने में।
जवानी से लेकर बुढ़ापे तक,
सिलसिला ये यूँ ही चलता रहा।
मंज़िल समझ हम पहुँचे जहाँ।
चल रही थी लड़ाई पहले से वहाँ,
लौटकर चले आए फिर हम,
हुआ सफर का आगाज़ जहाँ से।
रास न आया कुछ भी हमें,
तेरी बंदगी के सिवा जग में।
अब रहमत कर ज़रा तू उस पर
जो आस लगाए बैठा था हम पर!
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